मनोरंजन

अतिवृष्टि – मधु शुक्ला

 

आवश्यकता से अधिक, वर्षा है अतिवृष्टि।

जाने क्यों अन्याय यह, करती रहती सृष्टि।।

 

बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में, होती हाहाकार।

बेघर हो जाते कई , पानी से परिवार।।

 

सतत बरसता नीर जब , नदियां गहें उफान।

बाढ़ न आ जाये कहीं , घबराये इंसान।।

 

मनमानी की वृत्ति नित , पैदा करे प्रकोप।

प्रकृति लुटाये त्रासदी, सुविधाएं हों लोप।।

 

रखो प्रकृति से मित्रता, संभव तभी बचाव।

हमको संत सुजान सब , देते यही सुझाव।।

— मधु शुक्ला, सतना, मध्यप्रदेश

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