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स्वार्थ की परिभाषा – आर . सूर्य कुमारी

neerajtimes.com – स्वार्थ के बारे में इंग्लैंड के दार्शनिक थामस हाब्स ने कहा था कि मनुष्य जन्म से स्वार्थी होता है लेकिन मनुष्य की इस परिभाषा को समय – समय पर तमाम लोगों ने अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा और कहा ।
जहां तक स्वार्थ का सवाल है स्वार्थ निश्चित रूप से मनुष्य – मनुष्य के अंदर समाया हुआ है । हम नित दूसरों पर आरोप लगाते हैं कि फलां बड़ा स्वार्थी हैं , फलां बड़ा स्वार्थी हैं । लेकिन सच पूछा जाए तो संसार का हर मनुष्य स्वार्थी हैं , कोई ज्यादा है तो कोई कम है ।
यह बात ध्यान देने योग्य है , बहुत ही आम धारणा है कि जिस भी दिन हम किसी की मदद करते हैं तो अपने आप में उसी दिन यह अधिकार पा लेते हैं कि हमने जिसकी मदद की , समय आने पर वह भी हमारी मदद करेगा, फिर चाहे यह मदद मानवता के नाते निस्वार्थ भाव से की गयी हो या किसी विवशता के कारण जबर्दस्ती की गयी हो।

हां यह भी एक बात है कि उपरोक्त तरह की संविदा के बगैर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो मात्र स्वार्थ की भाषा ही बोलते हैं , बस मतलब ही निकालते हैं । दूसरों को मदद देने के वक्त भाग खड़े होते हैं । ऐसे स्वार्थी लोगों को न स्वर्ग में स्थान मिलता है न ही सुकून भरे संसार में और ऐसे लोग निश्चित रूप से सामने वालों की आंखों से गिर जाते हैं ।
सिर्फ पैसे की लेन – देन में ही नहीं अपितु सद्भावना – सदाचार का कोई भी विषय आए स्वार्थ बीच में आता ही है ।
हां जहां अवैध रूप से कोई अपना काम करता हो तो उसकी मदद नहीं करनी चाहिए । उसे सन्मार्ग बताना चाहिए । अन्यथा कानून का वास्ता देना चाहिए । यह सही है कि अनेक बार चुप्पी साध लेने की मजबूरी भी आ पड़ती है ।
स्वार्थ व नि:स्वार्थ की एक निश्चितता जरूर होती है । मनुष्य जन्म से एक सामाजिक प्राणी भी होता है। जन्म लेता है सिर्फ शरीर से,चला भी जाता है सिर्फ शरीर से और इन दो शाश्वतताओं के बीच का पूरा जीवन समाज पर निर्भर करके ही जीना पड़ता है । सच पूछा जाए तो ईमानदारी से व मानवता से जब दो लोग एक – दूसरे के प्रति स्वार्थ की भावना से जुड़ जाते हैं तो यह स्वार्थ स्वार्थ न रहकर परमार्थ बन जाता है, तो आइए इस परमार्थ का हम निष्ठा पूर्वक पालन करें । (विनायक फीचर्स)

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