एक कमरा,
बनाया था घर में।
बड़े जतन से
सजाया था
एक-एक कोना।
उम्मीद थी,
आएंगे मेहमान,
गूँज उठेगा घर।
आएगा कमरा काम।
जब तक आंगन
गोबर से लिपा था,
आते थे मेहमान ,
दो-चार।
अब आंगन भी ,
सीमेंट का हो गया,
दिल भी जैसे पत्थर ।
समय के साथ,
कुछ रिश्ते भी बदले ।
अब वह कमरा,
अक्सर बंद रहता है।
– प्रदीप सहारे, नागपुर महाराष्ट्र