कहां का फूल हूँ लेकिन कहां आकर खिला हूँ ।
पहाड़ी राज्य को उपहार में शायर मिला हूँ ।
लहू में ओज का अंदाज भी भरपूर मेरे ,
नहीं हारा कभी मैं जीत का वो सिलसिला हूँ ।
मुसाफ़िर हूँ पहाड़ों का मुहाज़िर मानना मत ,
नया है प्रांत पर मैं तो वही यू पी जिला हूँ ।
कहां तक के गयी मुझको ये जीवन की मसाफ़त,
अकेला ही चला पहले मगर अब काफ़िला हूँ ।
भले ही जिंदगी में आंधियां तूफान आए ,
कभी टूटा नहीं वो आब, मिट्टी का किला हूँ ।
नहीं कोठी से नखरे हैं नहीं महलों सा रुतबा ,
मकाँ हूँ गांव का मैं एक छोटा सा विला हूँ ।
जमाने से मिला जो दर्द हँसकर पी रहा हूँ,
शिकायत है न ‘हलधर’ से नहीं करता गिला हूँ ।
– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून