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ग़ज़ल (हिंदी) – जसवीर सिंह हलधर

कहां का फूल हूँ लेकिन कहां आकर खिला हूँ ।

पहाड़ी राज्य को उपहार में शायर मिला हूँ ।

 

लहू में ओज का अंदाज भी भरपूर मेरे ,

नहीं हारा कभी मैं जीत का वो सिलसिला हूँ ।

 

मुसाफ़िर हूँ पहाड़ों का मुहाज़िर मानना मत ,

नया है प्रांत पर मैं तो वही यू पी जिला हूँ ।

 

कहां तक के गयी मुझको ये जीवन की मसाफ़त,

अकेला ही चला पहले मगर अब काफ़िला हूँ ।

 

भले ही जिंदगी में आंधियां तूफान आए ,

कभी टूटा नहीं वो आब, मिट्टी का किला हूँ ।

 

नहीं कोठी से नखरे हैं नहीं महलों सा रुतबा ,

मकाँ हूँ गांव का मैं एक छोटा सा विला हूँ ।

 

जमाने से मिला जो दर्द हँसकर पी रहा हूँ,

शिकायत है न ‘हलधर’ से नहीं करता गिला हूँ ।

– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून

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