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गजल — मधु शुक्ला

धरा आकाश का शुचि रूप वंदित है,

गगन भू पर सकल संसार आश्रित है।

 

बसेरा चंद्र, रवि, तारे करें नभ में,

ग्रहों के त्याग से हर जीव परिचित है।

 

प्रगट नित सूर्य होता रश्मियाँ लेकर,

किरण के अंश से धरती प्रकाशित है।

 

दिया करता हमें नभ दान वर्षा का,

तभी तो आज तक यह सृष्टि जीवित है।

 

करे शशि दूर जीवों की थकावट को,

सुबह पर नींद का शुभ लाभ अंकित है।

— मधु शुक्ला, सतना,  मध्यप्रदेश

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