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आखिर क्यूँ बना रहे – भूपेन्द्र राघव

हम छोटे-छोटे से बच्चे,

अभी नही देखा संसार,

आखिर क्यूँ कर बना रहे हो,

हमको युद्धों के हथियार।

 

कलम चाहिए जिन हाथों में,

क्यों बंदूक थमाते हो,

है पढ़ने की उम्र हमारी,

लड़ना हमें सिखाते हो।

मानव होकर भूल गए क्यों

मानवता के ही आधार।

आखिर …………………….

अपने मंसूबों के खातिर,

हमको आगे करते हो,

नन्हें मासूमों के सर पर,

क्यों पिस्तौलें धरते हो।

खून की होली स्कूलों में,

क्यों कर होती है ह रबार।

आखिर …………………….

स्कूलों में बम रखवा कर,

आग लगाकर क्या पाते,

मासूमों की चीखें सुनकर,

दानव जैसे हर्षाते,

क्यों भाते हैं कृत्य घिनौने,

क्यों भातीं हैं चीख-पुकार।

आखिर …………………….

कभी बसों को अगवा करते,

कभी टिफिन में बम रखते,

बाज सरीखी शातिर आंखें,

बच्चों पर हरदम रखते,

तुम भी अपने माँ बापू के,

बच्चे होंगे आखिरकार।

आखिर …………………….

बहला फुसलाकर बच्चों का,

युद्धों में कर इस्तेमाल,

इस पृथ्वी पर कर डाला है,

हाल एकदम ही बेहाल,

नहीं रुकेगा अगर सिलसिला,

एक दिन सब होगा बेकार।

आखिर …………………….

– भूपेन्द्र राघव, खुर्जा, उत्तर प्रदेश

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