मनोरंजन

कविता – जसवीर सिंह हलधर

दुखी बागवां से बहारों की दुनिया ।

सगों से डरी है सहारों की दुनिया ।।

लगे दोष मढ़ने नदी के चलन पर ,

लहर ने उजाड़ी  किनारों की दुनिया ।।1

 

अलंकार गढ़ती सुनारों की दुनिया ।

समय खा गया है कहारों की दुनिया ।।

निज़ामे क़फ़स में मरे क्रांतिकारी ,

तिमिर में दबी है उजारों की दुनिया ।।2

 

हुई आज धूमिल निखारों की दुनिया ।

मरुस्थल ने सटकी फुहारों की दुनिया ।।

जमीं के चलन से परेशान अंबर ,

डरी और सहमी सितारों की दुनिया ।।3

 

किवाड़ों में दिखती दरारों की दुनिया ।

चुनर में छिपी है शरारों की दुनिया ।।

बुढ़ापा, जवानी चला खोजने को ,

दुखी मयकदों में खुमारों की दुनिया ।।4

 

चकाचौंध दिखती कुमारों की दुनिया ।

निरंकुश हुई है गवारों की दुनिया ।।

डरी और सहमी हैं कलियां चमन में ,

दबी वासना में दुलारों की दुनिया ।।5

 

कहां आज मधुरिम नज़ारों की दुनिया ।

कहां मौन बैठी करारों की दुनिया ।।

चुनावी कहानी सुनाओ न “हलधर “,

दिखा देश में कुछ सुधारों की दुनिया ।।6

– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून

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