दुखी बागवां से बहारों की दुनिया ।
सगों से डरी है सहारों की दुनिया ।।
लगे दोष मढ़ने नदी के चलन पर ,
लहर ने उजाड़ी किनारों की दुनिया ।।1
अलंकार गढ़ती सुनारों की दुनिया ।
समय खा गया है कहारों की दुनिया ।।
निज़ामे क़फ़स में मरे क्रांतिकारी ,
तिमिर में दबी है उजारों की दुनिया ।।2
हुई आज धूमिल निखारों की दुनिया ।
मरुस्थल ने सटकी फुहारों की दुनिया ।।
जमीं के चलन से परेशान अंबर ,
डरी और सहमी सितारों की दुनिया ।।3
किवाड़ों में दिखती दरारों की दुनिया ।
चुनर में छिपी है शरारों की दुनिया ।।
बुढ़ापा, जवानी चला खोजने को ,
दुखी मयकदों में खुमारों की दुनिया ।।4
चकाचौंध दिखती कुमारों की दुनिया ।
निरंकुश हुई है गवारों की दुनिया ।।
डरी और सहमी हैं कलियां चमन में ,
दबी वासना में दुलारों की दुनिया ।।5
कहां आज मधुरिम नज़ारों की दुनिया ।
कहां मौन बैठी करारों की दुनिया ।।
चुनावी कहानी सुनाओ न “हलधर “,
दिखा देश में कुछ सुधारों की दुनिया ।।6
– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून