मनोरंजन

गीतिका – मधु शुक्ला

काम काज को करें नमस्ते, दिन है जब रविवार का,

बाहर खायें पिक्चर देखें, लुफ्त उठायें प्यार का।

 

बार-बार ऋतुराज कहे यह, धन को सर्व न मानिए,

बीता वक्त न वापस आता, मान करो शृंगार का।

 

काम काज आवश्यक माना, पर आवश्यक प्रेम भी,

जीवन साथी खुश रहता तो, मौसम रहे बहार का।

 

हमें ईश ने जो बख्शा वह, जीवन धन अनमोल है,

इसे सजा अपनेपन से लो, लाभ प्रेम बौछार का।

 

खुशहाली  जीवन  में  आती, है  केवल अनुराग से,

अहं त्याग रिश्ते सुलझाओ, गुण सीखो सत्कार का।

— मधु शुक्ला, सतना , मध्यप्रदेश .

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