मनोरंजन

गीत – मधु शुक्ला

बातें कर के मीठी – मीठी, राज चुराते हैं।

तन के उजले मन के काले, दुख पहुँचाते हैं।

 

नये-नये लोगों से परिचय, होता ही  रहता।

मानव अपनी पीड़ा कहकर, मन हल्का करता।

जान कष्ट में जन को कपटी, अति हर्षाते हैं….. ।

तन के उजले मन के काले, दुख पहुँचाते हैं….. ।

 

सामाजिक प्राणी है मानव, रिश्तों में जीता।

कर्म करो मत फल चाहो, कहती है गीता।

नैतिकता की स्वार्थ लिप्त जन, हँसी उड़ाते हैं……. ।

तन के उजले मन के काले, दुख पहुँचाते हैं….. ।

 

मन माने जिनको शुभचिंतक, नाज करे जिन पर।

दुर्दिन  में  वे  साथ  न  देते, दूर रहें अक्सर…… ।

अपनेपन का ढ़ोंग रचा कर, हृदय जलाते हैं…….. ।

तन के उजले मन के काले, दुख पहुँचाते हैं…… ।

— मधु शुक्ला, सतना , मध्यप्रदेश

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