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ग़ज़ल – रीता गुलाटी

आज जी ले तू जरा घर हो न हो,

सोच मत यारा सितमगर हो न हो।

 

आज दिखता प्यार तेरा है बड़ा,

कल भले ऐसे ही मंजर हो न हो।

 

माँ पिता देते हमेशा है दुआ,

कल बनेगे वो सिकंदर हो न हो।

 

जो मिला मौका तुम्हें वो काम कर,

क्या पता फिर तो ये अवसर हो न हो।

 

आ सजा ले आँसमा खुशियों भरा,

कल हमारा ये मुकद्दर हो न हो।

 

काम कर ले,प्यार से,बाबू जरा,

क्या पता घर मे,मिले नौकर,हो न हो।

 

यार बैठे है महल  में प्यार से,

क्या पता ये भी मयस्सर हो न हो।

रीता गुलाटी ऋतंभरा, मोहाली,चंडीगढ़

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