मनोरंजन

कनेर – नीलकान्त सिंह

कनेर के पीले पीले फूल,

नहीं इसमें एक भी शूल,

रोज सुबह खिला करते हैं

और शाम को झर जाते हैं।

 

इन कनेरों के झुरमुट में ताकता हूॅं

तनिक भी उदासी नहीं दिखती

बस एक ही सबक मिलता है

कलियां खिलने को तैयार दिखती है।

 

कल शाम एक भी फूल नहीं था

आज सुबह फूल ही फूल नजर आए

दिवस भर सुन्दरता फैलाता रहा

शाम हुई,फिर वह झरते नजर आए।

 

जो अब तक होता रहा

आगे भी होता रहेगा

आज जो खत्म हुआ

कल फिर वह रहेगा।

 

यह क्रम चलता रहता है

जो आते हैं,वो जाते हैं

कभी सुख तो कभी दुख

सबके वक्त बीत जाते हैं।

 

जीवन कनेर सा होता है

खिलकर यह मुस्कुराता है

मुस्कुरा कर झर जाता है

झर कर फिर खिल जाता है।।

– नीलकान्त सिंह नील, बेगुसराए , बिहार

Related posts

प्रेरणा हिन्दी प्रचार सभा के तत्वावधान में राष्ट्रीय काव्य गोष्ठी आयोजित – कवि अशोक

newsadmin

करो मतदान – सुनील गुप्ता

newsadmin

ग़ज़ल – रीता गुलाटी

newsadmin

Leave a Comment