मनोरंजन

ग़ज़ल – विनोद निराश

बिछुड़ा ऐसे, याद आता रहा ,

रात भर, मुझे सताता रहा।

 

मुद्दत से नज़र कहाँ आया वो,

सूकूनो – चैन भी जाता रहा।

 

उसकी हर बात याद है मुझे,

पर गमे-जुदाई, खाता रहा।

 

उसके खफा होने के बाद भी,

दिन – रात, मुझे भाता रहा।

 

जुदा तो हुए थे मीठी बातों से,

पर जुबां पे तल्खी लाता रहा।

 

बेशक न देखा हो उसने मुझे,

पर गली में उसकी जाता रहा।

 

न सुनी कभी सदा जिसने मेरी ,

निराश उसे ही रोज़ बुलाता रहा।

– विनोद निराश, देहरादून

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