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होना कोई हानी – अनिरुद्ध कुमार

हरियाली धरती की आभा, सुंदरतम यह प्यारा।

रंग बिरंगी फूल कली से, महक रहा जग सारा।

वृक्ष लतायें जीवन दाई, चारो तरफ पसारा।

इसकी रक्षा हमको करनी, इनसे प्राण हमारा।

 

शुद्ध हवा जड़-चेतन पाये, हर जीवन को तारा।

औषधि जानो है हितकारी, गुणकारी वन सारा।

लोभी मानव भूल गया सब, देख चलाये आरी।

चेतो मानव अब तो चेतो, संकट दिखता भारी।

 

पर्यावरण जरूरी जानो, पेड़ हमारे रक्षक।

काहे रोज उजाड़े इनको, लगते इनके भक्षक।

भूल गये क्या गर्मी सर्दी, बादल बरखा पानी।

इनसे हीं संतुलन जहाँ का, कहते पंडित ज्ञानी।

 

जान समझले इन पेड़ों को, इनसे प्राण हमारा।

इनको मानो जग संरक्षक, समझो जान हमारा।

जागो चेतो पेड़ लगाओ, करना मेहरबानी।

पर्यावरण बचाओ मिलके, होना कोई हानी।

– अनिरुद्ध कुमार सिंह। धनबाद, झारखंड

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