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गीत (मधुवल्लरी छंद) – मधु शुक्ला

जल के बिना संभव नहीं है जिंदगी,

क्यों भूल बैठे नीर की हम वंदगी।

 

निर्झर, नदी, तालाब का जल घट रहा,

अब टैंकरों से नीर घर – घर  बँट रहा।

जीना कठिन होगा न यदि जनता जगी……. ।

 

क्यों स्त्रोत जल के लुप्त होते जा रहे,

बादल नहीं क्यों नीर लेकर आ रहे।

करने लगे हैं हम प्रकृति से भी ठगी…….. ।

 

हम वृक्ष काटेंगे नहीं प्रण लें अभी,

गहरे करें सब कूप नदियाँ हम अभी।

इनमें न फेंकें भूलकर भी गंदगी……..…।

— मधु शुक्ला,.सतना, मध्यप्रदेश .

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