neerajtimes.com – ‘प्रज्ञान’ बाल साहित्यकार डॉ. सत्यवान ‘सौरभ’ का बाल कविताओं का सुंदर संग्रह है, जिसमें 51 बाल कविताएँ संकलित हैं। हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा वर्ष 2023 के श्रेष्ठ कृति पुरस्कार से सम्मानित यह पुस्तक बालमन की सहज जिज्ञासाओं, कल्पनाओं, संवेदनाओं और जीवन मूल्यों को अभिव्यक्ति देने वाली पठनीय कृति है। इसकी कविताओं में जीवन के विविध रंग देखने को मिलते हैं।
सन् 1989 में हरियाणा में जन्मे डॉ. सत्यवान सौरभ बाल साहित्य के सुपरिचित हस्ताक्षर हैं। साहित्यकार, पत्रकार और अनुवादक के रूप में उन्होंने बच्चों के साथ-साथ बड़ों के लिए भी विपुल साहित्य सृजन किया है। बाल कविता की पुस्तकों के अतिरिक्त दोहा, कथा, कविता, अनुवाद, रूपांतरण और संपादन की अनेक कृतियों के माध्यम से उन्होंने हिंदी साहित्य में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। लगभग दो दशकों से स्वतंत्र लेखन के माध्यम से वे साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं।
‘प्रज्ञान’ संग्रह की पहली कविता ‘बने संतान आदर्श हमारी’ है। इसमें माता-पिता अपने आने वाले बच्चे के लिए सुंदर सपने संजोते हैं। वे चाहते हैं कि उनकी संतान जीवन में हमारे आदर्श महापुरुषों और महापुरुषाओं के श्रेष्ठ गुणों को आत्मसात करे तथा उनके बताए मार्ग पर चले। कविता में प्रह्लाद, ध्रुव, मैत्रेयी और गार्गी जैसे आदर्श चरित्रों का सहज चित्रण हुआ है। कवि का मानना है कि प्रत्येक बच्चे में नैतिकता, सत्यनिष्ठा और ज्ञान के प्रति समर्पण जैसे गुण होने चाहिए।
बालसाहित्य बच्चों का साहित्य है। इसमें उनकी कोमल भावनाओं और मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं का ध्यान रखना आवश्यक है। बच्चे मनोरंजन पसंद करते हैं, लेकिन कवि चाहता है कि वे जीवन और समाज की वास्तविकताओं से भी परिचित हों। आसपास फैली विसंगतियों के प्रति जागरूक करना भी कवि अपना दायित्व समझता है। ‘गूगल की आगोश में’ कविता में आधुनिक तकनीक के बढ़ते प्रभाव और परिवारों में घटते संवाद की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। कवि डिजिटल दुनिया में खोते बचपन और दादी की पीढ़ी के अकेलेपन को इन पंक्तियों में प्रस्तुत करता है—
छीन लिए हैं फोन ने, बचपन से सब चाव।
दादी बैठी देखती, पीढ़ी में बदलाव।।
मन बातों को तरसता, समझे घर में कौन।
दामन थामे फोन का, बैठे हैं सब मौन।।
आज के बच्चे ही कल के कर्णधार हैं। बड़े होकर इन्हीं के हाथों में देश की बागडोर होगी। इसलिए उनमें प्रारंभ से ही देशप्रेम और राष्ट्रीय गौरव की भावना विकसित करना आवश्यक है। ‘उड़े तिरंगा बीच नभ’ कविता में कवि ने बच्चों के मन में तिरंगे के प्रति सम्मान और देश के प्रति समर्पण का भाव जगाया है—
देश प्रेम वो प्रेम है, खींचे अपनी ओर।
उड़े तिरंगा बीच नभ, उठती खूब हिलोर।।
शान तिरंगा की रहे, दिल में लो ये ठान।
हर घर, हर दिल में रहे, बन जाए पहचान।।
बचपन जीवन का स्वर्णिम काल होता है। यही समय व्यक्ति के भविष्य की दिशा निर्धारित करता है। बचपन में प्राप्त संस्कारों का प्रभाव जीवनभर बना रहता है। कवि चाहता है कि बच्चे अपने शिक्षकों का सम्मान करें, नैतिक मूल्यों को अपनाएँ और जीवन में नए कीर्तिमान स्थापित करें। ‘नैतिकता की राह’ कविता के माध्यम से गुरु के प्रति कृतज्ञता और जीवन में नैतिकता के महत्त्व को रेखांकित किया गया है—
कभी न भूलें हम सभी, शिक्षक का उपकार।
रचकर नव कीर्तिमान दे, गुरु दक्षिणा उपहार।।
नैतिकता की राह से, दे जीवन सोपान।
उनके आशीर्वाद से, बनते हम इंसान।।
पर्यावरण संरक्षण आज के समय की बड़ी आवश्यकता है। बढ़ता प्रदूषण, वनों की कटाई और ओजोन परत को होने वाली क्षति समूचे मानव समाज के लिए चिंता का विषय है। पेड़ हमें प्राणवायु देते हैं और पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ‘ओजोन’ कविता के माध्यम से कवि बच्चों को पर्यावरण के प्रति सजग करते हुए प्रकृति संरक्षण का संदेश देता है—
आज विषैली गैस पर, नजर रखेगा कौन।
आग उगलती चिमनियाँ, चीर रही ओजोन।।
बढ़े प्रदूषण या घटे, हमको क्या है आज।
लूट रहे हैं मिल सभी, हम धरा की लाज।।
बच्चों के जीवन में माता-पिता का स्थान सर्वोपरि होता है। वे अपनी आवश्यकताओं और खुशियों के लिए माता-पिता पर निर्भर रहते हैं। संग्रह की कविता ‘रिश्ते’ में माँ और पिता के योगदान को संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त किया गया है—
पाई-पाई जोड़ता, पिता यहाँ दिन रात।
देता है औलाद को, खुशियों की सौगात।।
माँ बच्चों की पीर को, समझे अपनी पीर।
सिर्फ इसी के पास है, ऐसी ये तासीर।।
जीवन में गतिशील बने रहना आवश्यक है। बाधाओं से घबराकर रुक जाने के बजाय निरंतर आगे बढ़ते रहना ही सफलता का मार्ग है। ‘समय सिंधु’ कविता में कवि ने जीवन के संघर्षों का सामना करने और विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखने का संदेश दिया है—
पथ के शूलों से डरे, यदि राही के पाँव।
कैसे पहुँचेगा भला, वह प्रियतम के गाँव।।
रुको नहीं चलते रहो, जीवन है संघर्ष।
नीलकंठ होकर जियो, विष तुम पियो सहर्ष।।
बचपन मधुर कल्पनाओं और सुंदर सपनों का समय होता है। हर बच्चा अपने मन में बड़े-बड़े सपने सँजोता है। ‘बचपन के गीत’ कविता में कवि ने अपने बचपन की स्मृतियों, खेलों और ग्रामीण परिवेश को जीवंत किया है। इसमें बीते समय की आत्मीयता और प्रकृति के प्रति लगाव दिखाई देता है—
बचपन में भी खूब थे, कैसे-कैसे खेल।
नाव चलाते रेत में, उड़ती नभ में रेल।।
यादों में बसता रहा, बचपन का वो गाँव।
कच्चे घर का आँगना, और नीम की छाँव।
बच्चे प्रकृति से सहज अपनापन अनुभव करते हैं। प्राकृतिक दृश्य उन्हें आकर्षित करते हैं। कवि के भीतर का बालमन भी बचपन की स्मृतियों में लौटकर परियों, खेलों और गाँव की गलियों से संवाद करता है। बदलते समय में मोबाइल फोन के कारण बच्चों के पारंपरिक खेलों और पारिवारिक संवाद में आई कमी को भी कवि ने रेखांकित किया है।
‘दादा-दादी’ कविता में बुजुर्गों के प्रति आत्मीयता और उनके जीवन में महत्त्व को अभिव्यक्त किया गया है। दादा-दादी बच्चों को कहानियाँ सुनाते हैं, संस्कार देते हैं और परिवार को भावनात्मक आधार प्रदान करते हैं। उनके न रहने पर घर का आँगन सूना हो जाता है। कवि लिखता है—
दादा-दादी बिन हुआ, सूना-सूना द्वार।
कौन कहानी अब कहे, दे लोरी का प्यार।।
दादा-दादी बन गए, केवल अब फरियाद।
खुशियाँ आँगन की करे, रह-रह उनको याद।।
कवि की संवेदनशीलता का परिचय इस बात से भी मिलता है कि वह पुराने हो चुके झाड़ू में भी वृद्ध लोगों की छवि देखता है। उपयोग के बाद वस्तुओं को फेंक देने की प्रवृत्ति और वृद्धावस्था में बुजुर्गों की उपेक्षा के बीच कवि एक गहरी सामाजिक समानता स्थापित करता है। ‘वृद्धों की हर बात का’ कविता में आधुनिकता की आड़ में बुजुर्गों की उपेक्षा करने वाली मानसिकता पर प्रश्न उठाया गया है—
वृद्धों की हर बात का, रखता कौन खयाल।
आधुनिकता की आड़ में, हर घर है बेहाल।।
यश वैभव सुख शांति के, यही सिद्ध सोपान।
घर है बिना बुजुर्ग के, खाली एक मकान।।
उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि ‘प्रज्ञान’ बाल काव्य संग्रह की रचनाओं का प्रमुख स्वर मानवीय संवेदना, करुणा, नैतिकता और सामाजिक चेतना है। पर्यावरण, मौसम, धूप, सुबह, चिड़िया, तितली, गिलहरी, पत्ते, घास, हाथी, बादल, झील, चाँद, सूरज, बचपन, माँ-पिता, दीया, चिट्ठी-पत्री, बेटियाँ, नया साल, देश, त्योहार, क्षमा भाव, शहीद, ट्यूशन, गूगल, तिरंगा, किताब, स्कूल, पुलिस, नाना-नानी और अन्य पारिवारिक रिश्तों जैसे विविध विषयों पर कवि ने बालमनोविज्ञान के अनुरूप रचनाएँ प्रस्तुत की हैं।
संग्रह की भाषा सरल, सरस और सहज बोधगम्य है। कविताओं में बालसुलभ कल्पनाशीलता के साथ जीवनोपयोगी संदेश भी समाहित हैं। इनकी विशेषता यह है कि कवि बच्चों को उपदेश देने के बजाय मनोरंजन और संवेदना के माध्यम से जीवन के महत्त्वपूर्ण मूल्यों से परिचित कराता है। पुस्तक का मुद्रण सुंदर है तथा आवरण पर कवि के पुत्र ‘प्रज्ञान’ का मनमोहक चित्र पुस्तक को विशेष आकर्षण प्रदान करता है।
निस्संदेह, ‘प्रज्ञान’ केवल बाल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि बच्चों में मानवीय मूल्यों, प्रकृति प्रेम, पारिवारिक आत्मीयता, देशभक्ति और सामाजिक संवेदनशीलता विकसित करने का एक सार्थक साहित्यिक प्रयास है। हरियाणा साहित्य अकादमी का वर्ष 2023 का श्रेष्ठ कृति सम्मान इस पुस्तक की साहित्यिक उपलब्धि को रेखांकित करता है। बालमन को लुभाने वाली मनोरंजक एवं संवेदनशील कविताओं से सजी यह कृति बाल साहित्य जगत में अपनी विशिष्ट पहचान रखती है। इस सुंदर संग्रह के सृजन के लिए डॉ. सत्यवान ‘सौरभ’ को हार्दिक बधाई।
पुस्तक परिचय
– पुस्तक का नाम: प्रज्ञान
– लेखक: डॉ. सत्यवान ‘सौरभ’
– विधा: बाल काव्य
– प्रकाशक: प्रज्ञानशाला, आर के फ़ीचर्स, भिवानी।
– संस्करण: 2023
– मूल्य: ₹160
– पृष्ठ संख्या: 100
– सम्मान: हरियाणा साहित्य अकादमी का वर्ष 2023 का श्रेष्ठ कृति पुरस्कार
मूल समीक्षक: सुरेश चन्द्र ‘सर्वहारा’
3 फ 22, विज्ञान नगर, कोटा–324005 (राजस्थान)