जब-जब नभ पर बदरा छाएँ,
याद तुम्हारी आती है ,
सूने मन के आँगन को फिर,
प्रेम प्रीत दहकाती है
सावन की भीगी बूँदों में,
आहट लगती है तेरी,
सूखे मन की हर डाली को,
मेघ सींच दो तुम मेरी ।
शीतल मन्द सुगन्ध पवन नित,
हिय हिल्लोर उठाती है।।
सूनें मन के आँगन को फिर
प्रेम प्रीत दहकाती है।
मैं भी तो इन घन के जैसी,
पीर संग ही रखती हूँ,
ऊपर से मैं हँसती रहती,
भीतर गुमशुम रहती हूँ।
चंदा की ये शीतल छाया
रह-रह अंग जलाती है।
सूनें मन के आँगन को फिर
प्रेम प्रीत दहकाती है।
मन भर आया,नयन न बरसे,
कैसी यह मजबूरी है,
तुम बिन मेरे जीवन की ऋतु,
लगती सखे अधूरी है।
नभ पर घन की उमड़ घुमड़ ये,
धरती को तड़पाती है।
सूनें मन के आँगन को फिर
प्रेम प्रीत दहकाती है।
आओ प्रिय! भीगी बेला में,
बातें सारी कह डालें ,
प्रीत भरा दो चार दिनों का,
जीवन जी लें मतवाले।
आने वाली मधुरिम बेला
आंखें सोच लजाती है
सूनें मन के आँगन को फिर
प्रेम प्रीत दहकाती है।
-सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर