क्षण- क्षण देह तपती रही,
वियोग के घाव सहती रही,
गर्म आह की हवाएँ झुलसा गई,
कोमल मन से निकली
आह असर कर गई,
आखिर,
वसुधा की पीड़ा सुन ही ली,
बरस पड़े बादल,
धरा की राह पकड़ ही ली,
फैलेगी भावनाओं की लताएँ,
पनप उठेंगी दुर्वा सी इच्छाएं,
फिर से बरसेगा मनभावन सावन,
फिर लौट आयेगें मनमौजी बादल,
आहा,
भिगो कर अंतर्मन की परतों को,
नव जीवन की आशा बंधा गई,
आखिर बरस पड़े बादल,
धरा की राह पकड़ ही ली,
-रश्मि मृदुलिका, देहरादून, उत्तराखण्ड