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बदलते समय में बेटियों को कैसी शिक्षा दें कि वे निर्भीक भी बनें और संस्कारवान भी? – रीता गुलाटी

neerajtimes.com – बेटियाँ घर की रौनक ही नहीं, समाज और राष्ट्र का भविष्य भी हैं। वे आँगन की तुलसी हैं, जिनकी सुगंध पूरे परिवार को महकाती है। बदलते समय के साथ बेटियों की भूमिका, सोच और आकांक्षाओं में भी व्यापक परिवर्तन आया है। आज की बेटी शिक्षा, विज्ञान, राजनीति, साहित्य, खेल और व्यवसाय के हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रही है। फिर भी उसके सामने अनेक चुनौतियाँ हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि हम अपनी बेटियों को कैसी शिक्षा दें, जिससे वे निर्भीक होकर अपने सपनों को साकार कर सकें और साथ ही अपने संस्कारों की जड़ों से भी जुड़ी रहें?

निर्भीकता की पहली पाठशाला है परिवार

बेटी के व्यक्तित्व की नींव उसके घर में ही पड़ती है। यदि बचपन से ही उसे हर बात पर चुप रहने, अपनी इच्छा दबाने और दूसरों की हाँ में हाँ मिलाने की शिक्षा दी जाएगी, तो उसके भीतर आत्मविश्वास कैसे विकसित होगा? बेटियों को अपनी बात स्पष्ट रूप से रखने, अनुचित व्यवहार का विरोध करने और अपने अधिकारों के प्रति सजग रहने की सीख देनी चाहिए।

उन्हें यह विश्वास दिलाना आवश्यक है कि उनकी आवाज़ भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितनी परिवार के अन्य सदस्यों की। उन्हें अच्छे-बुरे स्पर्श की पहचान, संकट के समय सहायता माँगने, आत्मरक्षा और डिजिटल सुरक्षा की जानकारी भी दी जानी चाहिए। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि बेटी किसी परेशानी में हो, तो उसे डाँट या दोषारोपण का भय न हो; वह निःसंकोच अपने माता-पिता से अपनी बात कह सके।

संस्कारों का अर्थ चुप्पी नहीं, विवेक है

अक्सर संस्कारों की परिभाषा बेटियों के व्यवहार तक सीमित कर दी जाती है। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे धीमे बोलें, विरोध न करें, बड़ों की हर बात मानें और परिवार की प्रतिष्ठा के लिए अपनी इच्छाओं का त्याग करती रहें। किंतु क्या यही संस्कार हैं?

वास्तव में संस्कार वह धरोहर हैं, जो मनुष्य को विनम्रता, करुणा, सत्यनिष्ठा, सहिष्णुता और मानवीयता का मार्ग दिखाते हैं। संस्कारवान बेटी वह नहीं जो अन्याय सहती रहे, बल्कि वह है जो बिना कटुता के अपनी बात कह सके, दूसरों का सम्मान करे और अपने आत्मसम्मान की रक्षा भी करे।

हमें बेटियों को यह समझाना होगा कि बड़ों का आदर करना अच्छी बात है, लेकिन गलत बात का विरोध करना भी उतना ही आवश्यक है। विनम्रता उनकी शक्ति बने, विवशता नहीं; सहनशीलता उनका गुण बने, शोषण का आधार नहीं।

शिक्षा दे ऐसी, जो आत्मनिर्भर बनाए

बेटियों की शिक्षा केवल अच्छे अंक प्राप्त करने अथवा डिग्री हासिल करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्हें ऐसी शिक्षा मिलनी चाहिए, जो उन्हें जीवन की वास्तविक चुनौतियों का सामना करना सिखाए। आर्थिक साक्षरता, निर्णय लेने की क्षमता, कानूनी अधिकारों की जानकारी, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और व्यावहारिक कौशल उनके व्यक्तित्व को सशक्त बनाते हैं।

आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बेटी अपने निर्णय अधिक विश्वास के साथ ले सकती है। इसलिए उसे अपनी रुचि के अनुसार शिक्षा और करियर चुनने का अवसर मिलना चाहिए। उसके सपनों को केवल इसलिए छोटा नहीं कर देना चाहिए कि वह लड़की है या भविष्य में उसे गृहस्थ जीवन सँभालना है।

यह भी आवश्यक है कि बेटियों को घर के कामों में दक्ष बनाने के साथ बेटों को भी घरेलू जिम्मेदारियाँ निभाना सिखाया जाए। घर सँभालना किसी एक लिंग का दायित्व नहीं, बल्कि परिवार के प्रत्येक सदस्य की साझा जिम्मेदारी है।

बदलते समय में आधुनिकता को अपनाना आवश्यक है, लेकिन आधुनिक होने का अर्थ अपनी भाषा, संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों से विमुख होना नहीं है। बेटियों को अपनी परंपराओं पर गर्व करना सिखाएँ, मगर साथ ही उन्हें प्रश्न पूछने और तर्क के आधार पर निर्णय लेने की स्वतंत्रता भी दें।

उन्हें धार्मिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों का परिचय कराएँ, साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित करें और महापुरुषों के साथ-साथ उन महान महिलाओं के जीवन से भी परिचित कराएँ, जिन्होंने साहस, बुद्धिमत्ता और सेवा के बल पर इतिहास रचा।

सबसे जरूरी है कि हम उनके सामने अपने आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करें। यदि घर में महिलाओं का सम्मान होगा, बेटा-बेटी के बीच भेदभाव नहीं होगा और परिवार में संवाद की संस्कृति होगी, तो बेटियाँ स्वतः ही समानता, संवेदना और जिम्मेदारी के मूल्य सीखेंगी।

डर नहीं, विश्वास दीजिए

बेटियों की सुरक्षा के नाम पर उन पर अनावश्यक पाबंदियाँ लगाना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। उन्हें दुनिया से दूर रखने के बजाय दुनिया को समझने की दृष्टि देना आवश्यक है। सावधानी सिखाना जरूरी है, लेकिन हर समय भयभीत रखना उचित नहीं।

उन्हें अपनी पसंद चुनने, मित्र बनाने, प्रश्न पूछने और जीवन के निर्णयों में भागीदारी करने का अवसर दें। गलती होने पर केवल दंड देने के बजाय उससे सीखने की प्रेरणा दें। माता-पिता का विश्वास बेटी के लिए वह संबल है, जो कठिन परिस्थितियों में भी उसे टूटने नहीं देता।

साथ ही समाज और विद्यालयों की भी जिम्मेदारी है कि वे ऐसा वातावरण बनाएँ, जहाँ लड़कियों को समान अवसर, सुरक्षित परिवेश और अपनी प्रतिभा विकसित करने की स्वतंत्रता मिले। बेटियों को निर्भीक बनाने का दायित्व केवल परिवार का नहीं, पूरे समाज का है।

उपसंहार :

बेटियों को निर्भीक और संस्कारवान बनाने के लिए हमें उनकी परवरिश में भय के स्थान पर विश्वास, भेदभाव के स्थान पर समानता और मौन के स्थान पर संवाद को महत्त्व देना होगा। उन्हें इतना सशक्त बनाएँ कि वे अपने अधिकारों के लिए खड़ी हो सकें और इतने संवेदनशील भी बनाएँ कि दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना न भूलें।

याद रखिए, संस्कार बेटी के पंख नहीं काटते, बल्कि उन्हें सही दिशा में उड़ना सिखाते हैं। उसे ऐसी शिक्षा दें कि वह अपनी जड़ों से जुड़ी रहे, लेकिन उसकी उड़ान आकाश की सीमाएँ भी लाँघ सके।

क्योंकि एक शिक्षित, निर्भीक और विवेकशील बेटी केवल अपना भविष्य नहीं सँवारती, वह परिवार को दिशा देती है, समाज की सोच बदलती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए नई राहें खोलती है।

बेटी को इतना विश्वास दीजिए कि वह अन्याय के सामने झुके नहीं, इतने संस्कार दीजिए कि वह किसी का अपमान न करे और इतनी शिक्षा दीजिए कि वह अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने में सक्षम हो। यही बदलते समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ

 

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