दर्द मे पहुंचा वो मधुशाला नही।
बिन पिये जाना कोई हाला नही।
रात दिन तड़पा बेचारा दर्द मे,
हाल कोई पूछने वाला नही।
पाँव रगड़ा जो नही दिन रात मे,
उसकी किस्मत का खुला ताला नही।
आज देखी भी कहाँ छोरी कोई,
बात कर दो चार पर बाला नही।
मन को मेरे भा गयी सुंदर कली,
रंग उसका देख लूँ काला नही।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ़