सितंबर… अहा!!!
नवाँ महीना, ऋतु-संधि का सेतु,
जहाँ स्मृतियों के दीप जलते हैं
और मौसमों की परछाइयाँ
एक-दूसरे से आलिंगन करती हैं।
मोहन, गणेश, विश्वकर्मा
और मेरा जन्म मास है इसलिए
सितंबर विशेष तो है।,
भादो की शुरुआत भी
कभी बादल गीत गाकर
बारिश को न्योता देता तो कभी
यह नीलगगन नीलम रत्न है,
जिस पर बिखरे हैं बादल रूपी
श्वेत मोती,
और पुखराज-सा दमकता
सुनहरा सूर्य।
खिड़की से झाँकते ही लगता है
मानो तरु-शाखाएँ हँस पड़ी हों,
जैसे भुट्टे की परत हटते ही
मकई के दाने
किलक उठते हैं।
सितंबर कानों में फुसफुसाता है—
सरसराहट से भरी वह आवाज़
जैसे कोरे गाल पर
पहला चुपका-सा बोसा,
जो हृदय में
सिहरन जगाकर भाग जाए।
यह महीना है,
मानो कन्या को
हल्दी-चंदन का उबटन लगाकर
विवाह-दिन के लिए
सजाया जा रहा हो।
बरसात के बाद की हल्की धूप,
धुले-धुले वृक्षों पर
फूटी हुई तरुणाई,
धान, मक्का और बाजरे की बाली
मानो प्रेमालाप करती हो।
और शरद, धीरे से
कानों में मुस्कराकर कहती है—
“मुझे पाकर
तुम और निखर गए न?”
यही तो समय है
गुरुओं को वंदन करने का,
जब प्रवासी पक्षी लौटते हैं
अपने पूर्वजों के आँगन,
जब पितृपक्ष आरंभ होकर
पूर्वजों का आगमन होता है,
जब गणेशोत्सव गूँजता है,
माता का स्वागत होता है,
और फूलों से भरे बगीचे
बाहें फैलाकर
मानव को अपने स्नेह में
भर लेना चाहते हैं।
जैसे नौ महीने की प्रतीक्षा के बाद
नवजीवन शिशु
माँ की गोद में आता है,
वैसे ही सितंबर है,
सृजन और स्मरण का मास,
खुशियों का आगमन,
नवप्रभा का उद्घोष।
सितंबर…
अहा, अनंत सौंदर्य का
जीवंत रूप!
-सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर