पहला शब्द “माँ” सिखाया, पहली डगर दिखाया,
गिरते ही गोद में लेकर, फिर से चलना सिखाया।
भूख लगे तो स्तन से, नींद आए तो लोरी से,
जीवन का हर पाठ पढ़ाया माँ ने प्यारी बोली से।
बिना कॉपी-किताब के, संस्कारों का ज्ञान दिया,
“सच बोलो, झूठ न बोलो” यही पहला पाठ दिया।
चोट लगे तो फूंक मारे, बुखार में रात जगें,
प्रथम गुरु माँ ही है, जिसके चरणों में स्वर्ग लगे।
दुनिया की भीड़ में जो, सबसे मीठा रिश्ता है,
माँ की ममता में ही तो, ईश्वर का वास दिखता है।
सौ तीरथ एक माँ के चरणों की धूल बराबर,
उसके आशीष से ही जीवन सफल होता हर बार।
– डॉ अनमोल कुमार, मोकामा जिला पटना बिहार