मनोरंजन

ना आपस में अब बात – डॉ. प्रियंका सौरभ

जब से आई गाँव में, ये शहरी सौगात।

मेड़ करें ना खेत से, आपस में अब बात।।

 

पीपल वाली छाँव भी, लगती अब सुनसान,

चौपालों की हँसी गई, खो बैठे मुस्कान।।

मोबाइल के जाल में, उलझे सब दिन-रात—

मेड़ करें ना खेत से, आपस में अब बात।।

 

खेतों की हरियालियाँ, बिकने लगीं मकान,

माटी वाली गंध पर, चढ़ बैठा सामान।।

छूटी रिश्तों की गली, सूने पड़े जज़्बात—

मेड़ करें ना खेत से, आपस में अब बात।।

 

पहले दुख-सुख बाँटते, पूरा था परिवार,

अब तो अपने लोग भी, लगते हैं बेग़ार।।

स्वार्थों की आँधी चली, लिए घात-प्रतिघात—

मेड़ करें ना खेत से, आपस में अब बात।।

 

नदिया, कुआँ, बावड़ी, सब होते कंगाल,

पैसों की इस दौड़ में, मरते लोक-खयाल।।

फिर से माटी से जुड़ें, जागें वही जज़्बात—

मेड़ करें फिर खेत से, आपस में कुछ बात।।

– डॉ. प्रियंका सौरभ, उब्बा भवन, आर्यनगर,

हिसार (हरियाणा) – 125005, मोबाइल: 7015375570

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