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ग़ज़ल – रीता गुलाटी

यार हमने  कहा वो सुना तो नही,

जो किया आपने वो व़फा तो नही।

 

दर्द उसने दिया गैर अब मान कर,

टूट कर जो गिरा आईना तो नही।

 

मै तो बुनता रहा प्यार के धागे को,

सब समझ के तुम्हे अब पता तो नही।

 

हम च़रागे बने जो उजाले  लिये,

तेज आँधी से कोई बचा तो नही।

 

आज कातिल बना *ऋतु का मुंसफिर बड़ा,

क्या वो देगा गवाही पता तो नही।

– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़

 

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