मनोरंजन

सर्दी की धूप जैसे तुम – रुचि मित्तल

कोई शोर नहीं, कोई जल्दबाज़ी नहीं

बस एक धीमी, लगातार मौजूदगी

जैसे सूरज की किरणें

बिना पूछे, बिना शर्त

चुपचाप सब कुछ छू लेती हैं

तुम दूर होकर भी

इतने पास हो

कि साँसों के बीच का फासला

धूप की तरह महसूस होता है

गर्म, मुलायम, और

थोड़ा-सा जलन भरा

फिर भी मैं बार-बार मुड़कर देखती हूँ

कहीं वो धूप अभी भी तो नहीं खड़ी है

खिड़की के उस कोने में

मेरे लिए इंतज़ार करते हुए

जनवरी की सर्दी की धूप जैसे

तुम हो।

और मैं अभी भी उसी रोशनी में

खड़ी हूँ

न ठिठुरती , न जलती

बस जीती हुई ।

©रुचि मित्तल, झज्जर, हरियाणा

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