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स्मृति श्रृंगार की – सविता  सिंह

श्रृंगार क्या है

केवल सौंदर्य प्रसाधन?

या एक स्त्री के आत्मसम्मान की पहचान?

क्रूर काल जब

छीन ले प्राणाधार,

तो क्यों बदल दी जाती है

उसकी पहचान?

किसने रचा यह नियम

कि अब न सजे वह सिंदूर,

जबकि उसका गौरव

अब भी जीवित है।

बिंदी यदि मस्तक का ताज थी,

तो उसे उतारने का अधिकार किसे है?

उसमें तो बसती है

प्राणेश की स्मृति,

जो दर्पण देखते ही

धड़क उठती है।

जो सब कुछ खोकर भी

जीवन ढो रही है

क्या उसके अभिमान को

मिटा देना ही शोक है?

रुदाली बनकर

आँसू बहाने वाले,

उसकी महासागरीय पीड़ा के आगे

बौने नहीं लगते?

खनकने दो उसकी चूड़ियाँ,

चमकने दो माथे की बिंदी।

यादों का पिटारा खोलकर

वह फिर से जी लेगी

पायल, बिंदी, बनारसी…

उस स्वामीहीना की

आह मत लो

उसे मजबूत रहना है,

मर्यादा में

अपना वजूद बचाना है।

श्रृंगारहीन देख

कितनी ही कुत्सित दृष्टियाँ

राहों में उतर आती हैं

श्रृंगार

उसका कवच है।

पुरुष विधुर हों

तो वेश क्यों नहीं बदलता?

फिर स्त्री ही क्यों

रंग-विहीन?

श्रृंगार

सौंदर्य नहीं,

नारी का अभिमान है।

भावनाओं से जुड़ा

एक जीवित अलंकार।

ज़िंदगी समाप्त नहीं होती—

उसे

अपनी इच्छा से

जीने दो।

-सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर

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