मनोरंजन

ग़ज़ल – रीता गुलाटी

बुनते थे ख्याब दिल मे अभी आकर सुला दिये।

सपनों  मे खो रहे थे,तुम्ही ने बस जगा दिये।

 

दिल आ गया है उसपे हमारी खता नही।

शिद्दत से यार सर को उसने झुका दिये।

 

वो दूर रह रहा था भले शिकवा किये बिना।

आँखो मे सोये ख्याब किसी ने जगा दिये।

 

तुमने तो जिंदगी को कभी रूसवा नही किया।

सोचे  सदा तसुव्वर मे तभी मुस्कुरा दिये।

 

करते हैं प्यार तुमसे यूँ सदियों से हम भले।

देखो जनाब कुदरत ने हमे फिर मिला दिये।

 

ये और बात है जिसे मैं समझता हूँ अब बड़ा।

खामोश रहके हमको वो मेहरबा दुआ दिये।

– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़

Related posts

मैं – सुनीता मिश्रा

newsadmin

कविते ! तुम मेरी मधुशाला हो – किरण मिश्रा

newsadmin

अब न कुछ आस ना ही अंकुरण – सविता सिंह

newsadmin

Leave a Comment