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जीवन में अभिमान नहीं –  अनिरुद्ध कुमार

जिंदा हैं पर जान नहीं,

अपनों में पहचान नहीं।

चिंतित हर पल रहतें हैं,

क्या होगा अनुमान नहीं।

 

जीवन में सम्मान नहीं।

बातों में वह मान नहीं।

जा के सह छाती तानें,

आकर्षक सुरतान नहीं।

 

अपनों से तिरस्कार मिलें,

आदर या सतकार नहीं,

सहमा जीवन कटता है,

पहले जैसा प्यार नहीं।

 

रोज निराशा झेल रहें,

जीना अब साकार नहीं।

हर दिल में बसना चाहा,

मनभावन वो धार नहीं।

 

आशा का बंधन टूटा,

माया का आकार नहीं।

अपने मदमें सब मातें,

प्रेम भरा व्यवहार नहीं।

 

बंजर लगता है जीवन,

आशा में वह गान नहीं।

तेरा जाना क्या जाना,

जीवन में अभिमान नहीं।

– अनिरुद्ध कुमार सिंह

धनबाद, झारखंड

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