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क्या बिगड़ जाता? – नन्दिता माजी शर्मा

neerajtimes.com – क्षत विक्षत अवस्था में किसी दुर्घटनाग्रस्त मनुष्य को देखकर उसे अस्पताल पहुंचाने के स्थान पर मोबाइल निकाल कर घटनास्थल का वीडियो बनाने का ख्याल आना मानवों में तेजी से विकसित होती अमानवता का ही प्रमाण है। यहाँ हमारे समक्ष समाज के रूप में दो जमघट है- एक वह जमघट जो एक लहूलुहान पीड़ित व्यक्ति को बीच रास्ते में तड़पता देखकर भी उसको अस्पताल पहुंचाने के बजाय घटनास्थल की रील बनाकर वायरल होने में जुट गई और एक वह जमघट जो पीड़ित के जीवनलीला समाप्त होने के बाद में मृतक के परिवारों को न्याय दिलवाने के लिए अपने निजी कार्यों को छोड़कर कैंडल मार्च के लिए एकत्रित हुई, भीड़ तो दोनों अनजानों की ही है परन्तु उद्देश्य अलग। क्या होता यदि उस भीड़ ने पीड़ित व्यक्ति के प्रति सहानुभूति दिखाई होती, समय पर कोई उचित क़दम उठाया होता, शायद एक जीवन आज सांसें लें रहा होता और एक माँ की कोख हरी-भरी खिली होती और शायद न्याय की गुहार लगाने के लिए सड़कों पर उतरे इस भीड़ को अस्तित्व में आना ही नहीं पड़ता। पहले की तुलना में आज की तारीख में बेहतरीन यातायात सुविधाएं, आधुनिक तकनीकों से लैस उत्तम व्यवस्थाएं, नवीनतम शिक्षा प्रणालियाँ, तेज संचार, प्रचार प्रसार के साधन सभी मिनटों में उपलब्ध हैं, एक फोन की घंटी पर एम्बुलेंस, कैब सभी उपलब्ध हैं, पीड़ित को पहुँचाने वालों से प्रशासन द्वारा न्यूनतम पुछताछ का प्रावधान भी है फिर क्यों हम किसी के बहुमूल्य जीवन को बचाने को प्राथमिकता नहीं दे पाते। मानवों के भीतर दिन-ब-दिन तेजी से बढ़ता हुआ मानवता का अभाव आने वाले वैचारिक पंगुता को दर्शाता है। तो आखिर सबसे बुद्धिमान माने वाले जीव में कमी कहाँ है?
उत्तर है – कमी है परहित चिन्तन में, कमी है संस्कारों में, कमी है वैचारिक पारदर्शिता में, कमी है जनकल्याण के प्रति समर्पण में, कमी है निस्वार्थ भावनाओं में, कमी है वास्तविक मानवता में और यह कमी मानवों को दानवों से भी जघन्य बना रही है, अपने लिए तो हर जीव भरण, पोषण, रक्षण करता ही है, औरों के लिए करना ही हमें सबसे अलग एक मानव बनाता है। क्या बिगड़ जाता किसी का यदि उस काल के ग्रास बन रहे पीड़ित युवा को समय रहते अस्पताल पहुंचा देते तो? क्या बिगड़ जाता उन अभिभावकों का यदि वे अपने नाबालिगों पर वाहन चलाने पर रोक लगाते तो? क्या बिगड़ जाता यदि गाड़ियों के स्पीडोमीटर में अत्यधिक स्पीड का विकल्प ही नहीं होता तो, क्या बिगड़ जाता उस भीड़ का यदि वो उस समय रील न बनाते तो? क्या बिगड़ जाता यदि हम कुछ देर के लिए औरों को अपनाते तो?
ये सवाल आत्मा को भीतर तक झकझोरते है, मैं तो बस अपने मन की बात लिख रही हूँ, जिनपर ये विपदा आई है उनके दर्द की कल्पना करना मेरे लिए कल्पनाओं में भी संभव नहीं है। ईश्वर उन्हें शक्ति दे इस वज्रपात को सहने की और न्याय की इस लड़ाई को लड़ने के लिए अपार साहस।     ~ नन्दिता माजी शर्मा

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