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ग़ज़ल – रीता गुलाटी

खोजी थी नौकरी, हो गुज़र,कुछ नही हुआ,

बस जिंंदगी गयी थी बिखर,कुछ नही हुआ।

 

बेरंग हो गयी थी मेरी  कि जिंदगी बड़ी,

मर कर हो भी जाएँ अमर कुछ नही हुआ।

 

होना नही उदास भी,रोना नही तुम्हे,

रोये तमाम उम्र, मगर कुछ नही हुआ।

 

हँसकर खुशी से जी, भूलो गमों को तुम,

होना नही तुझे  पत्थर,कुछ नही हुआ।

 

महकी हुई थी शाम जब तुम आ मिले,

हँसते कटी दोपहर, कुछ नही हुआ।

– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़

 

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