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बसंतपंचमी – रुचि मित्तल

पंचमी उस दिन का नाम नहीं

जब ठंड चली जाती है

बल्कि उस क्षण का नाम है

जब मन मान लेता है

कि जड़ता अब

ज्यादा दिन टिक नहीं पाएगी।

यह ऋतु का उत्सव नहीं

चेतना का ऐलान है

जहाँ माँ सरस्वती

शब्दों में नहीं

विवेक में उतरती हैं।

पीला रंग कपड़ों में नहीं

सोच में उतरना चाहिए,

तभी बसंत

मौसम से पहले

इंसान के भीतर आता है।

बसंतपंचमी

कोई त्योहार भर नहीं

यह मन के भीतर

जमी हुई उदासी पर

धीरे से रखी गई

उम्मीद की हथेली है।

©रुचि मित्तल, झज्जर, हरियाणा

 

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