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निरंतर – सविता सिंह

 

कभी एकांत में कहाँ रह पाती हूँ,

जैसे गर्भ में शिशु पलता है

माँ की साँसों के सहारे,

वैसे ही तुम धड़कते रहते हो

मेरे अंतर में निरंतर।

इसका समय केवल नौ माह का नहीं,

यह तो ताउम्र का है

अविरल, अनवरत, अनन्त।

– सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर

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