राष्ट्रीय

जातीय उन्माद और नफरत फैलाने वालों के विरुद्ध अभियान की आवश्यकता – डॉ. सुधाकर आशावादी

neerajtimes.com – बिना किसी आरोप के किसी संभ्रांत व्यक्ति को जेल में डालने से कार्यपालिका की कितनी किरकिरी हो सकती है, इसका उदाहरण लियर के अधिवक्ता श्री अनिल मिश्रा की गिरफ़्तारी और रिहाई प्रकरण में दृष्टिगत हुआ। कहना ग़लत न होगा कि देश को जातीय उन्माद और नफरत की आग में झौंकने का प्रयास करने वाले तत्वों के विरुद्ध क़ानून सम्मत अभियान चलाये जाने की आवश्यकता है।
दलित राजनीति के नाम पर कभी मनुस्मृति तथा अन्य हिंदू ग्रंथों का अपमान करने तथा उनका दहन करने वाले तत्वों पर अंकुश लगाने का समय आ गया है। यदि समय से ऐसे तत्वों को दंडित नही किया गया, तो देश में अराजकता का वातावरण फैलने से नहीं रोका जा सकता। नफरत की राजनीति में दलित बनाम सवर्ण की लड़ाई में अधिवक्ता अनिल मिश्रा को बिना किसी आधार के गिरफ़्तार करने के षड्यंत्र का पर्दाफ़ाश होने से स्पष्ट हो चुका है, कि क़ानून का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता।
विचारणीय बिंदु यह है कि क्या किसी फ़रार अभियुक्त की रिपोर्ट पर किसी बुद्धिजीवी को गिरफ़्तार किया जा सकता है ? बहरहाल अनिल मिश्रा की गिरफ़्तारी को अवैध ठहराकर मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने उन तत्वों के षड्यंत्र को ध्वस्त कर दिया, जो जातीय संकीर्णता के आधार पर हिंदू धर्म ग्रंथों का अपमान करके समाज में अराजकता फैलाने पर आमादा थे।
यही नही, पुलिस, प्रशासनिक अधिकारी व अराजक तत्वों द्वारा अनिल मिश्रा को गिरफ़्तार कराने के मंसूबे भी ध्वस्त हुए, जिससे न्याय के प्रति विश्वास बढ़ा है। अनिल मिश्रा की गिरफ़्तारी को अवैध ठहराने से स्पष्ट हो गया है, कि अब अराजक तत्वों के मंसूबे सफल नही होने वाले। समय आ गया है कि हिंदू धर्म से जुड़े ग्रंथों का अपमान करने वाले तत्वों को कठोर सजा से दंडित किया जाए । (विनायक फीचर्स)

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