Neerajtimes,com टनकपुर – टनकपुर में स्थित पूर्णगिरि धाम आस्था और सौंदर्य का अद्भुत संगम है। यह महान तीर्थ अपनी दिव्यता और अलौकिक वातावरण के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। यहाँ की आबो-हवा में ही एक ऐसी पवित्र शांति का अनुभव होता है, जो मन को स्वतः ही स्थिर कर देती है। प्रकृति ने इस क्षेत्र को अनुपम सौंदर्य से सजाया है, जो हर आगंतुक के हृदय को सहज ही मोह लेता है।
यात्रा मार्ग में एक ओर पहाड़ों से झाँकती सुनहरी किरणें और दूसरी ओर बहती शारदा नदी का निर्मल प्रवाह मन को स्पर्श करता हुआ अंतर्मन को झंकृत कर देता है। लगभग तीन किलोमीटर की चढ़ाई के पश्चात जब शिखर में माँ पूर्णागिरी के दर्शन होते हैं, तो दिव्य दृश्य पाकर मन हर्ष और उल्लास से भर उठता है। ऊपर से दिखाई देती शारदा नदी की विस्तृत पावन धारा, उसके किनारे बसे दूर-दूर तक फैले गाँव, कस्बे तथा सामने दृष्टिगोचर होता नेपाल का प्राकृतिक सौंदर्य यह समूचा दृश्य किसी स्वर्गीय अनुभूति से कम नहीं लगता।
मंदिर से नीचे उतरकर शारदा नदी के उस पार नेपाल में स्थित सिद्ध बाबा के दर्शन को यात्रा का अनिवार्य अंग माना जाता है। मान्यता है कि सिद्ध बाबा के दर्शन के बिना पूर्णगिरि यात्रा अधूरी रहती है। भारत–नेपाल सीमा पर बसे टनकपुर में श्रद्धालुओं की सुविधा हेतु स्कूटी, टैक्सी और टेंपो जैसी यातायात व्यवस्थाएँ सहज रूप से उपलब्ध हैं। दर्शन के पश्चात श्रद्धालु स्थानीय बाजारों से खरीदारी कर अपनी यात्रा को और अधिक स्मरणीय बनाते हैं।
पूर्णगिरि धाम की महत्ता अत्यंत पावन मानी जाती है। ऐसी दृढ़ आस्था है कि यहाँ श्रद्धा और विश्वास के साथ की गई प्रत्येक मनोकामना पूर्ण होती है। इस स्थल की धार्मिक मान्यताएँ, दिव्य वातावरण और प्रकृति की निकटता मन को गहराई से छूती हैं तथा भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं। यही कारण है कि पूर्णगिरि धाम केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि आस्था, शांति और सौंदर्य का सजीव अनुभव है।
नेपाल और भारत के साहित्यिक–सांस्कृतिक बंधन की नींव अत्यंत सुदृढ़ है। दोनों देशों को प्रेम-सेतु में बाँधती शारदा नदी केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि भावनाओं की प्रवाहिनी है। उसका वेग मन में हिलोरें जगाता हुआ पूर्ण तन्मयता से बहता है। इसके तट पर खड़े होकर ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति स्वयं काव्य में ढल गई हो। साहित्यिक दृष्टि से देखा जाए तो यह संपूर्ण परिवेश कवितामय होकर गूँज उठता है। पर्वतों से टकराती वेदों की स्वर-लहरियाँ मानो शब्द-सरिता बनकर प्रवाहित होती हैं और अंतर्मन को आह्लाद से भर देती हैं।
शारदा की धारा में समय, स्मृति और संस्कार एक साथ प्रवाहित होते प्रतीत होते हैं। इसके तट उस साझा विरासत के साक्षी हैं, जहाँ भाषा, लोकगीत और लोककथाएँ सीमाओं से परे एक-दूसरे से संवाद करती हैं। यहाँ की हवा में भी मानो किसी प्राचीन ऋचा की अनुगूँज है, जो मन को स्निग्धता प्रदान करती है।
इस नदी के संग-संग चलता पथ यात्रियों को केवल गंतव्य तक नहीं, बल्कि आत्मिक निकटता तक ले जाता है। शारदा के किनारे खड़े होकर यह अनुभूति और गहरी हो जाती है कि संस्कृति किसी रेखा में बँधी नहीं होती वह बहती है, जोड़ती है और पीढ़ियों तक संवेदना का संचरण करती रहती है। इसी प्रवाह में यह यात्रा एक स्मरणीय अध्याय बनकर मन-पटल पर अंकित हो गई।
~ कविता बिष्ट ‘नेह’अध्यक्ष, जीवन्ती देवभूमि