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गुरु वंदन  (अगुतंक कविता) – डॉ अमित कुमार

माँ —
जिसने प्रथम शब्द सिखाया,
जिसकी लोरी में
जीवन का पहला संगीत बसा।
उसकी ममता ही
मेरे व्यक्तित्व की जड़ें बनी,
उसका आशीष ही
मेरे हर कदम की शक्ति बना।

पिता —
जो निःशब्द तपस्वी हैं,
त्याग की मूर्ति,
परिश्रम की मिसाल।
उन्होंने ही दिखाया
कि कठिनाइयाँ बाधा नहीं,
बल्कि चरित्र गढ़ने की कार्यशाला हैं।
उनका अनुशासन ही
मेरे जीवन की दिशा बना।

और फिर गुरु —
जिन्होंने अक्षरों का अर्थ बताया,
विचारों को आकार दिया,
सत्य, धर्म और कर्तव्य की पहचान कराई।
गुरु केवल शिक्षक नहीं,
गुरु वह दीप हैं
जो अंधकार मिटाकर
ज्ञान की मशाल थमाते हैं।

गुरु वह शक्ति हैं
जो आत्मा को जाग्रत करती है,
गुरु वह पथप्रदर्शक हैं
जो साधारण मनुष्य को
महान बना देते हैं।

शिक्षक दिवस पर
मैं नमन करता हूँ
उन समस्त गुरुओं को
जो माँ की ममता,
पिता के हौसले
और अपने ज्ञान के प्रकाश से
जीवन को अमूल्य बना देते हैं।

गुरु वंदन ही
सच्चा जीवन वंदन है,
क्योंकि जहाँ गुरु नहीं,
वहाँ न प्रकाश है, न विकास।
-डॉ अमित कुमार बिजनौरी
कदराबाद खुर्द स्योहारा
जिला बिजनौर उत्तर प्रदेश

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