मनोरंजनऐ री सखि – अनुराधा पाण्डेय by newsadminNovember 30, 20250118 Share0 सम्मुख जिसके सब झुक जाए । चिर आनंदित जो कर जाए । देखूँ तो मन होता चंगा । क्या सखि गंगा? . . . नहीं… तिरंगा । मोहनि रूप हिया बस जाए शीतल छटा नेह छलकाए। मदिर प्रेम का डारे फंदा… क्या वो साजन? . . . भक्क री! चँदा।। – अनुराधा पाण्डेय, द्वारिका, दिल्ली