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ऐ री सखि – अनुराधा पाण्डेय

सम्मुख जिसके सब झुक जाए ।

चिर आनंदित जो कर जाए ।

देखूँ तो  मन   होता  चंगा ।

क्या सखि गंगा?

.

.

.

नहीं… तिरंगा ।

मोहनि रूप हिया बस जाए

शीतल छटा नेह छलकाए।

मदिर प्रेम का डारे  फंदा…

क्या वो साजन?

.

.

.

भक्क री! चँदा।।

– अनुराधा पाण्डेय, द्वारिका, दिल्ली

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