मनोरंजन

मेरी कलम से – रुचि मित्तल

 

आँखों से पढ़कर मिरे, टूटे दिल के घाव,

आधी पढ़कर छोड़ दी उसने वहीं किताब।

हर पन्ने पर ज़ख्म थे, अक्षर अक्षर पीर,

होना था वो हो गये, पढ़कर मुझे अधीर।

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हम चिरागों को जलाये जा रहे हैं,
औ हवाएं तेज चलने पर तुली हैं।

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यादों का कारवां तेरा रोका न जायेगा,

रह रह के प्यार तेरा मुझे याद आयेगा।

जा तो रहा है रब्त सभी तोड़ कर तो जा,

जाते हुए मुझसे तुझे देखा न जायेगा।

©रुचि मित्तल, झझर , हरियाणा

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