यार मेरा तू ही मेरी जान है।
मुझको भाती अब तेरी मुस्कान है।
अब सजी महफिल हमारी शान है।
हाथ खाली क्यो नही सामान है
आज मेहनत से तू कर ले काम को।
मुफलिसी बन जायेगी मेहमान है।
चाँद छूने अब चली हैं बेटियाँ।
पा रही जग मे बड़ा सम्मान है।
प्रेम आँखो से जता दूँ अब जरा।
प्रेम की हद ही मेरी पहचान है।
वो बनी ज़ाज़िब है दिल मे आ बसी
उसके चेहरे पर सजी मुस्कान है।
कर्ज मे क्यो डूबते किसान भी।
ग़म़दीदा होकर वो देते ज़ान है।
डर रहा क्यो अब दुखो से आदमी।
रख ले हिम्मत संग जब भगवान है।
रात दिन मेहनत करे है अब तो *ऋतु।
खूबियों से अपनी वो अंजान है।(मक्ता)
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ़