खोज रही अति व्याकुल हो अपने प्रिय माधव को ब्रजरानी ।
श्याम सिवा कुछ याद नहीं सगरे जग से सुधि है अनजानी।
बोल रहा दृग नीर निरंजन ठीक नहीं इतनी मनमानी।
आन मिलो अब शीघ्र सखा मनुहार करे यह चूनर धानी।।
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द्वार-द्वार गाती रहें, खुशियाँ मङ्गल गान,
सबके चेहरों पर रहे, उजली-सी मुस्कान,
करुणा उपजाती रहे, सब में सेवा भाव-
अन्तस् का उल्लास तब, होगा आयुष्मान।।
-मणि अग्रवाल”मणिका”, देहरादून उत्तराखंड