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उत्तराखंड गठन – क्षमा कौशिक

मैं उत्तराखंड हूँ।
प्रकृति की मैं दिव्य छटा,ऋषि-मुनियों की तपस्थली हूँ।
पावन भूमि देवों की मैं, नरसिंहों की कर्म स्थली हूंँ।
वीरसुता वीरों की भूमि, योग धरा मैं धर्मस्थली हूंँ।
तीलू रौतेला बासंती गौरादेवी की पुण्यस्थली हूंँ।
मैं उत्तराखंड हूंँ।।

हिम की बर्फीली चोटी, मस्तक का मेरे शुभ मुकुट है।
कल-कल बहती गंगा जमुना सरस्वती धारा प्रकट है।
चारधाम मुझ में अति पावन पंच केदारा उच्च शिखर हूँ।
हरिद्वार हरिहर की भूमि, ऋषिकेश आध्यात्म प्रवर हूँ।
मैं उत्तराखंड हूंँ।।

संस्कार की उद्भवशाला संस्कृती की हम जोली हूंँ।
पर्व हरेला फूलदेई जागर, माँ नंदा की डोली हूंँ।
ब्रह्म कमल श्रृंगार है मेरा, फूलों की अनुपम घाटी हूँ।
युद्ध विजय में भर उमंग में गीत छोलिया मैं गाती हूंँ।
मैं उत्तराखंड हूंँ।।
शिव साधक जग मोह त्याग कर, करें तपस्या कंदर में।
ढोल दमाऊ बजते रहते,शंख बजे नित मंदर में।
वनस्पति भंडार है मुझ में, जड़ी बूटियां अंचल में।
स्वर्ग से सुंदर काया मेरी, प्यार बसा अंतस्थल में।
मैं उत्तराखंड हूँ।
इतना ध्यान रहे बस तुझको, रूप न मेरा विकृत हो।
पर्यावरण सुखद हो मेरा, ताकि मानव उपकृत हो।
सर्वस्व लुटाने वाली माता क्रोधित भी हो सकती है।
सौम्य रूप तज कर वह अपना, रौद्र रूप धर सकती है।।
अपने रक्षक पुत्रों पर ,सर्वस्व लुटाती जननी हूँ।
मैं उत्तराखंड हूँ
– डॉ क्षमा कौशिक, देहरादून , उत्तराखंड

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