मनोरंजन

अनकही तकलीफें – प्रियंका सौरभ

तकलीफें, जो दिखती नहीं,

मगर भीतर चुभती रहती हैं।

कह न सके जो दिल की भाषा,

वो लहरें मद्धम-सी बहती हैं।

 

आँखों में छुपा हुआ समंदर,

जो कभी बह निकले न सके।

मौन से बुनी हुई एक कथा,

कोई सुन सके, कोई न सके।

 

मुस्कान के पर्दे के पीछे,

छुपा एक अकेला साया है।

जिसके दर्द को समझ न सका,

वो दिल का कोई माया है।

 

धूप में भी ठंडी छाँव सी,

कहीं ये पीड़ा छुपी रहती है।

अधरों पर अनकहे गीत,

मन की कोई पुकार सुनती है।

– प्रियंका सौरभ, 333, परी वाटिका,

कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी)

भिवानी, हरियाणा – 127045,

 

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