तेरी यादों में रत रहना, अच्छा लगता है…..।
मुझको तेरा पागल कहना,अच्छा लगता है… ।
ऐसे तो होगीं जग भर में,
कितनों के हित कितनी राहें।
मुझको पर पावन लगती है,
केवल विहगे ! तेरी बाँहें ।
तेरे घर का बस पथ गहना,अच्छा लगता है ।
मुझको तेरा पागल कहना,अच्छा लगता है ।
धूप छाँव आतप आँधी सब,
लगते मुझको खेल -खिलौने ।
जीवन में तेरे बिन मुझको ,
कभी न भाते नर्म बिछौने।
तेरे हित शत-शत व्रण सहना,अच्छा लगता है ।
मुझको तेरा पागल कहना,अच्छा लगता है ।
-अनुराधा पांडेय, द्वारिका, दिल्ली