मैंने एक फूल मांगा था, उसने तो गुलदान दे दिया ।
दोहे का वर मांग रहा था, पूरा छंद विधान दे दिया ।।
मलयानिल सा सोया था मैं, सपनों के गहरे सागर में ।
लेकिन अब अहसास हुआ है ,सिंधु भरा उसने गागर में ।
अर्पित कर दी पूजा थाली, राम कथा मुझसे लिख वाली ,
लोक गीत गाने वाले को, कविता का वरदान दे दिया ।
मैंने एक फूल मांगा था, उसने तो गुलदान दे दिया ।।1
वो अंनत करुणा का सागर, मैं गंवार मूढ़ अभिमानी ।
भू मण्डल के ओर छोर पर, उससे बड़ा कौन है दानी ।
मेरी अभिलाषा थी छोटी , उसकी परिभाषाएं मोटी ,
शब्दों की छोटी मूरत को, छंदों का अनुमान दे दिया ।
मैंने एक फूल मांगा था, उसने तो गुलदान दे दिया ।।2
मैं था एक अनाड़ी मानस, कविता राह दिखाई उसने ।
मेरे इस नीरस जीवन में, रस की चाह जगाई उसने ।
सारे जग का दर्पण उसमें, जन्म मृत्यु का तर्पण उसमें ,
एक गाँव की मांग रखी थी, पूरा हिंदुस्तान दे दिया ।
मैंने एक फूल मांगा था, उसने तो गुलदान दे दिया ।।3
यदि वो चाहे तो फूलों की, शैया पर भी मानस रोये ।
वो चाहे तो कांटों पर भी, लंबी गहरी नींद सँजोये ।
जब वो चाहे भाग्य जगा दे, पानी में भी आग लगा दे ,
हलधर” जैसे देहाती को, साहित्यक सम्मान दे दिया ।
मैंने एक फूल मांगा था, उसने तो गुलदान दे दिया ।।4
– जसवीर सिंह हलधर , देहरादून