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मैंने चाहा कि—? – गुरुदीन वर्मा

 

मैंने चाहा कि——-,

नहीं, मैं यह नहीं करूँ,

दिखाऊँ नहीं अपनी शर्म,

बताऊँ नहीं खुद को बेशर्म,

लेकिन मैं,

मेरे मन को बदल नहीं सका।

 

मैंने चाहा कि———,

नहीं, अब नहीं करूंगा मैं,

इस तरह समझौते दिल खोलकर,

अपनी इच्छाओं को दबाकर,

किसी से या अपने मन से,

लेकिन मैं,

अपनी इच्छाओं को नहीं सका।

 

मैंने चाहा कि———-,

अब मेरा यह नियम रहेगा,

इस प्रकार होगी मेरी दिनचर्या,

और अटल होगा मेरा निर्णय,

विपत्तियों से विचलित नहीं होना,

लेकिन मैं,

पिघल गया किसी के दर्द से।

मैंने चाहा कि———–,

दौलत तो मैं कमा ही रहा हूँ ,

और खून-पसीना भी बहा रहा हूँ ,

बढ़ती जा रही है मेरी परिधि भी,

मेरा मान-सम्मान भी बढ़ना चाहिए,

लेकिन मैं,

अपनी छवि को बदल नहीं सका।

मैंने चाहा कि————— ?

– गुरुदीन वर्मा.आज़ाद

तहसील एवं जिला-बारां (राजस्थान)

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