उनसे न पूछिए मज़ा बारिश की बूँद का,
छप्पर तलक़ नसीब न जिनको कभी हुआ।
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छोटी सी है तमन्ना दिले बेकरार की,
आँसू मैं तेरी आँख के सारे खरीद लूँ।
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दुनिया की दौलतों से मिलेगी वफ़ा नहीं,
बाज़ार में पैसा लिए बैठे रहोगे तुम।
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बोलना आदत तुम्हारी थी सदा से
लब मेरे मज़बूरियाँ खुलवा रही हैं।
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आँसुओं की कद्र करना सीख लो
गम के सागर में उतरना सीख लो
जिंदगी से इश्क़ है तुमको अगर
हर कदम पर यार मरना सीख लो।
©रुचि मित्तल, झझर , हरियाणा