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एक नंबर – जया भराड़े बड़ोदकर

neerajtimes.com – शेखर कुमार अपनी दुनिया में शांति से जी रहा था। 4 थी जैसे तैसे पास कर ली थी। पांचवीं में रहने की जगह बदलनी पड़ी थी। पिता वॉचमैन की नौकरी करते थे। मां घर-घर जाके काम करती थी। छोटी बहन अभी स्कूल नहीं जा सकती थी। वो अपनी मां के पीछे-पीछे घूमती रहती थी। नई जगह से स्कूल दूर हो गया था। लेकिन ये स्कूल की टीचर ने उसे क्लास में मोनिटर बना दिया। वो बहुत खुश हो रहा था कि उसे क्लास में अपनी मर्जी से इधर उधर जा सकता था। समय पर वो क्लास वर्क होम वर्क करके और फिर दूसरे बच्चों को मदद करता था। टीचर बहुत खुश रहती थी। पर शेखर घर से गरीब और मजबूर होने के कारण किताबें कॉपी खरीद नहीं पाता था। टीचर ने उसे सब कुछ लाकर दिया ताकि वह अपनी पढ़ाई पूरी कर सके। इतना सब कुछ होने पर भी शेखर अच्छे नंबर नहीं ला पा रहा था। अब वो घर से स्कूल आने जाने में बहुत वक्त लग जाता। घर के काम और बहन की जिम्मेदारी उसे पढाई करने से पहले ही थका देती। एक बार टीचर ने शेखर को क्लास में सोते हुए देखा। वो रिसेस में सो गया था। उसने टीचर को कुछ भी नहीं कहा। पर टीचर अब सतर्क हो गई थी। उसने शेखर को कहा कि अगर तुम पढ़ाई में प्रथम स्थान आए तो तुम्हारी फीस माफ कर दी जाएगी। शेखर ये सुन कर बहुत खुश हो गया। शेखर ये सुन कर बहुत खुश हो गया। उसने घर में सारे काम कर के रात में जागता मां पिता को बहन को संभाल कर उन्हें कोई खबर नहीं होती कि वो कैसे मेहनत कररहा है। और फिर उसकी एक दिन मेहनत रंग लाई। वह क्लास मे प्रथम स्थान आया। टीचर ने उसे पुरस्कार दिया और स्कॉलरशिप भी मिलने लगीं। वह बड़ा होकर इक बड़ा वैज्ञानिक बना। – जया भराड़े बड़ोदकर, टाटा सेरीन, थाने वेस्ट, महाराष्ट्र

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