मनोरंजन

अमिय क्षण – सविता सिंह

 

नैन के कोर पर रुके-थमे जो नीर थे,

क्षण विलगने का हुआ झरने को अधीर थे।

मन विकल ना हो कहीं देख ये सजल नयन

हँस के कर दी विदा हिन्द के जो वीर थे।

प्रेम का अमिय था क्षण और बिरह हम सहे,

तेरी आँखों ने भी दर्द सभी वो कहे।

ये केसरिया रंग मुझे इस कदर भा गया,

तुमको जाते हुए हंस के देखते रहे।

कैसे रोकें भला बात जब वतन की हो,

प्राण जान सब निसार बात अमन की हो।

अब सोलह श्रृंगार तिरंगा ही तो है,

शोभे ध्वजा तन पर बात जब कफन की हो।

– सविता सिंह मीरा  जमशेदपुर

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