रात है घनेरी छाई कृष्ण जन्म बेला आई
कारागार के भी द्वार आप खुल जाएंगें।
प्रहरी सब सो जाएं अवतारी तब आएं
सूप में लिटा के शिशु, गोकुल में लाएंगे।
देवकी यशोदा सोएं शिशु बदले तो रोए
विधना का खेल भला कैसे जान पाएंगे।
तारणहार हैं आये संग खुशियाँ भी लाये
हर्ष से जन्म अष्टमी सभी जन मनाएंगे।
माताओं के भाग जगे ममता से मन पगे
कान्हा का जनम हुआ गली-गली शोर है।
झूम रहे नर-नारी पूरी ज्यों इच्छाएं सारी
मही के उद्धार हेतु हुई नई भोर है।
सबसे है जुड़ा नाता, सखा बंधु पिता माता
सबको रखे जो बाँध अनदेखी डोर है।
नए-नए स्वाँग करें खेल में विपद हरें
मोहन की संगत में नाचे मन मोर है।
– कर्नल प्रवीण त्रिपाठी नोएडा, उत्तर प्रदेश