राष्ट्रीय

दंभी चरित्रों का दंभ तोड़ने में माहिर भारत – डॉ. सुधाकर आशावादी

neerajtimes.com – भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति परस्पर सहयोग एवं हस्त कला कौशल के चलते आदिकाल से समृद्ध रही है। पुरानी व्यवस्थाओं में कृषि पर आधारित अर्थ व्यवस्था में सम्पूर्ण समाज की भागीदारी सुनिश्चित थी। कृषि उपज में किसान व मज़दूरों की हिस्सेदारी थी। सामाजिक और पारिवारिक उत्सवों में समाज का प्रत्येक वर्ग यथासंभव सहयोग दिया करता था। राष्ट्र को स्वावलंबी व अनेक कुरीतियों से मुक्त कराने के लिए अनेक महापुरुषों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, पंडित मदन मोहन मालवीय, आचार्य विनोबा भावे, महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने समाज को शिक्षा एवं रोज़गार के सूत्र दिए।
भले ही कालांतर में राजनीति के कुछ सत्तालोभी तत्वों ने समाज को जातियों में बाँटने का कुत्सित प्रयास किया हो। फिर भी भारत अपनी वैचारिक प्रतिभा के बल पर अंतर्राष्ट्रीय जगत में अपनी विशिष्टता के लिए पहचाना जाता रहा । आज के प्रगतिशील युग में जब कुछ राष्ट्र अपनी शक्ति के दंभ में चूर हैं तथा अमेरिका स्वयं को विश्व का चक्रवर्ती सम्राट सिद्ध करने के लिए अन्य देशों पर अपनी अकड़ दिखाने का कोई अवसर नहीं चूक रहा है तब मात्र भारत ही ऐसा देश है, जो सर्वे भवंतु सुखिनः के भाव से सभी देशों से मैत्री पूर्ण सम्बंध रखने का पक्षधर रहा है। अनुकूल परिस्थिति न होने पर भारत ने समय समय पर विश्व के अनेक दंभी चरित्रों का दंभ तोड़ा है।
यदि भारत वासी सच्चे मन से ठान लें कि स्वदेशी वस्तुओं को बढ़ावा देना है, तो भारत में अनेक समस्याओं का स्वतः समाधान हो सकता। भारत की विश्व स्तर पर बढ़ती स्वीकार्यता एवं लोकप्रियता के चलते अमेरिकी राष्ट्रपति का दर्द समझा जा सकता हैं। भारतीय उत्पादों पर पच्चीस प्रतिशत टैरिफ वसूलने तथा अन्य देशों से तेल ख़रीदने पर जुर्माना लगाने का ट्रम्प का आदेश अमेरिकी राष्ट्रपति की नीयत पर सवाल उठाता है। दुखद आश्चर्य तो तब होता है कि जब भारत के प्रमुख विपक्षी दल ट्रम्प के सुर में सुर मिलाकर अपनी ही सरकार को घेरने का दुस्साहस करते हैं, जैसे उन्हें अपने देश की विदेश नीति तथा देश के स्वाभिमान से कोई सरोकार न हो।
बहरहाल भारतीय लोकतंत्र सुदृढ़ है। अन्य देशों की तुलना में भारतीय अर्थव्यवस्था संतुलित है। सच यही है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की साख बढ़ी है तथा वस्तुस्थिति यह भी है कि भले ही विदेशी शक्तियाँ अपनी प्रभुसत्तावादी नीतियों के चलते भारत के व्यापार जगत को क्षतिग्रस्त करने का प्रयास करें, मनमाने आयात शुल्क लगाकर या जुर्माने के प्रावधान करके भारत पर दवाब बनाने का प्रयास करें, लेकिन भारत अपनी स्वदेशी अपनाओ की नीतियों से ऐसे प्रावधानों का मुंहतोड़ उत्तर देने में पीछे नहीं है। आवश्यकता इस बात की भी है कि सभी दंभी चरित्रों को सबक़ सिखाया जाए, चाहे देशी हों अथवा विदेशी। (विनायक फीचर्स)

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