राम राम जो जन जपते हैं।
बिन बाधा भव से तरते हैं।
निश्छल भावों को पढ़ राघव ,
केवट तरनी में चढ़ते हैं।
लख शबरी की श्रद्धा पावन ,
चखे बेर प्रभु जी चखते हैं ।
देख विभीषण उर सच्चाई,
शरण भावना को गहते हैं।
भक्त सभी प्रिय रामचंद्र को,
पर कपीश ज्यादा जचते हैं।
– मधु शुक्ला, सतना, मध्यप्रदेश