बिन तुम्हारे ये दिल खिला कब है,
साथ तेरा सदा,मिला कब है।
रात दिन देखता ख्यालो मे,
सच मे अपनों से मिला कब है।
माँ के जैसा नही कोई होता,
उसको लखते जिगर गिला कब है।
सामना खूब मौत का कुर्बत से,
मौत के सामने हिला कब है।
हो गये हैं शहीद वतन खातिर,
दुशमनों से कमर किया कब है।
साथ रहता है चाँद अब उसके,
चाँदनी के बिना खिला कब है।
जिंदगी डूब जाती लहरो में,
आदमी मौत से लड़ा कब है।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़